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फूल और कांटे

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तकदीर का है फैसला तो क्या करे
वो हो नहीं सकते अपने तो क्या करे
फूल खिलते है बाग़ में
सजते है पंडाल में तो क्या करे
फूल खिलते है तो खिलते ही रहेंगे जिन्दगी में
कभी न कभी तो अच्छे लोग मिलते रहेंगे
हम तो वो काटें है जो करते है हिफाजत फूलो की
पर फूलो की बदकिस्मती है
की वो सजते है किसी और के बालो पर
हमने अपना फर्ज निभाया
काँटा बनकर उनको मुसीबतों से बचाया
पर जब छोड़ा साथ फूल ने कांटे का
तो फूल ही जिन्दगी में अकेला होकर मुरझाया
और कांटे ने तो फिर भी किसी और को ही बचाया



नवदीप चतुर्वेदी, कानपूर

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