रेत के टीलों पर
जाने का मन हुआ तो
पहुँच गया मगर
कुछ कंकालों को देखकर
लगा कि -
कितना बड़ा सच हमारे सामने
अचानक सा आ जाता हैं !
सौन्दर्य को सजाने वाली चमड़ी नहीं है,
इशारों में बातें करती आँखें नहीं हैं
किसी की बाँहों में समाने का अहसास नहीं हैं
अपने प्रियजन के लिए सोचता दिमाग नहीं हैं
किसी के लिएँ धड़कता दिल नहीं हैं
हैं तो सिर्फ कंकाल...
जो सत्य हैं हमारे जीवन का...
जिसने भी साथ छोड़ा था वो तो बाहरी था
जो सत्य हैं वो बचाता हैं
और
जो अलौकिक हैं वो आत्मा भी
परमात्मा की ओर खींची जाती हैं... !
हम कौन हैं और हमारा क्या हैं?
जीवन का सत्य तो हैं -
रेत के टीलों में खोया हुआ सा... !!!

पंकज त्रिवेदी
http://www.vishwagatha.blogspot.com (हिन्दी साहित्य)
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