Monday, May 21st

Last update12:21:27 PM GMT

Profile

Layout

Direction

Menu Style

Cpanel
You are here: विचार सामयिक रेत के टीलों में

रेत के टीलों में

  • PDF

रेत के टीलों पर
जाने का मन हुआ तो
पहुँच गया मगर
कुछ कंकालों को देखकर
लगा कि -
कितना बड़ा सच हमारे सामने
अचानक सा आ जाता हैं !
सौन्दर्य को सजाने वाली चमड़ी नहीं है,
इशारों में बातें करती आँखें नहीं हैं
किसी की बाँहों में समाने का अहसास नहीं हैं
अपने प्रियजन के लिए सोचता दिमाग नहीं हैं
किसी के लिएँ धड़कता दिल नहीं हैं

हैं तो सिर्फ कंकाल...
जो सत्य हैं हमारे जीवन का...
जिसने भी साथ छोड़ा था वो तो बाहरी था
जो सत्य हैं वो बचाता हैं
और

 

जो अलौकिक हैं वो आत्मा भी
परमात्मा की ओर खींची जाती हैं... !
हम कौन हैं और हमारा क्या हैं?
जीवन का सत्य तो हैं -
रेत के टीलों में खोया हुआ सा... !!!

 

 

 

 

 

 

 

पंकज त्रिवेदी

http://www.vishwagatha.blogspot.com (हिन्दी साहित्य)

This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it

Add your comment

Your name:
Your email:
Subject:
Comment:

झारखंड

राँची

जमशेदपुर

धनबाद

हमसे संपर्क करें

खबरवाला में छपी किसी सामग्री पर कोई टिप्पणी अथवा सूचना, समाचार, आलेख, गतिविधि, पुरस्कार, सम्मान आदि की जानकारी देने के लिए संपर्क करें -

डा. अनिल कुमार, संपादक

editor@khabarwala.com