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You are here: विचार सामयिक ज़ख्म भी कैसें ?

ज़ख्म भी कैसें ?

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समंदर की लहरों ने कैसे बरपाया हैं कहर आज
दर्द आया तो लगा कि क्यूं ज़िंदा हैं हम यहाँ पर

ज़िन्दगीयाँ कितनी यहाँ पर तमाम हो गई हैं आज
क्या अजीब बात हैं कुदरत और इंसान की यहाँ पर

काम आता हैं इंसान को इंसान ही, फिर भी क्यूं
याद दिलाता हैं कौन आकर खुद की हमें यहाँ पर 

वक्त ने खींचीं ली हैं जब लकीरें हमारे दिलों पर,
ज़ख्म भी कैसे दुल्हन से शरमाने लगे यहाँ पर? 

 

 

 

 

 

 

पंकज त्रिवेदी

http://www.vishwagatha.blogspot.com (हिन्दी साहित्य)

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