शंकर पुणतांबेकर
मैंने इसके पूर्व में 'समय' पर लिखा। वहाँ वास्तव में समय-स्वरुप और वर्तमान समय पर लिखा गया जबकि उसे पढ़कर पाठक यह शिकायत कर सकते हैं कि मैंने उसमें खुद अपने संदर्भ में कही भी कुछ नहीं बताया है कि मैं किन-किन स्थितियों से गुजरा, विपरीत स्थितियों को मैंने कैसे झेला आदि। शिकायत वाजिब कही जायेगी निबंध में विषय कुछ भी हो 'मैं' केंद्र में होता है। इस शिकायत की संभावना को लक्ष्य कर ही मैं यह 'समय और मैं' लिख रहा हूँ।
हम समय में तब प्रवेश करते हैं जब अपने पैरों खड़े हो जाते हैं। इसके पूर्व का समय तो वास्तव में परोसा हुआ समय होता है जिसे हमें चाहें या न चाहें स्वीकार करना होता है। माता-पिता, गुरु परोसते हैं इसे। माता-पिता की इस कृति में उन्हें उनकी गरीबी-अमीरी, उनका व्यवसाय, संस्कार, देशकाल प्रभावित करते हैं। देशकाल मेरे बचपन में शहर भी गुड़ चना था आज देहात भी चाकलेट है। तब रेडियो अमीरी में ही होते थे अब गरीबी में भी टीवी देख पड़ते है। तब या तो पिछड़ेपन की स्वच्छता थी कि इतने साबुन नहीं थे या आज विकास की गंदगी है कि ढेर सारे साबुन हैं। तब समय के अनुरुप चीाों की आवश्यकता थी, अब चीाों के अनुरुप समय की आवश्यकता है। गुरु भी तब ज्ञानी थे डिग्रीधारी नहीं, अब तो डिग्रीधारी होते हैं बस। मेरे शिक्षाकाल में समय में गति नहीं थी। गति नहीं थी पर जीवंतता थी। हम जैसे मुकाम पर पहुंचे हुए यात्री हो। हमें अब बस, अपने मुकाम को संवारना है सहयात्रियों के सुख-दुख को देखना है। तात्पर्य तब हम लक्ष्य पर थे सो जीवंतता थी, अब तो हमें मुकाम ही अपने ज्ञात नहीं, सो चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं। हम आज समय की ऐसी फास्ट गाड़ी में सवार हैं जिसके प्लेटफार्म तो हैं बाजारयुक्त, पर जिनका कोई नाम गाम नहीं हैं। यह मैं सफल आदमी की यात्रा की बात कर रहा हूँ।
उस शिक्षाकाल में पैसे की चमक-दमक नहीं थी, जो व्यक्ति-केद्रित और समाज-प्रदूषक होती है, तब श्रध्दा-विश्वास-बंधुत्व की सहजता थी जो समाज केंद्रित और व्यक्ति-पोषक थी। हाँ अंधविश्वास, अज्ञानता, असहायता थे पर वे आज के भ्रष्टाचार, शोषण, सांप्रदायिकता जैसे भयावह नहीं थे। स्कूल-दवाखाने-दफ्तर इतने नहीं थे, पर जो थे वे दुकान-मुक्त थे। शिक्षाकाल में समय जैसे सपना होता है। सच कहें तो हमें सपने देखने की ठीक से तमीज भी नहीं होती, पर ये सपने बदतमीज नहीं होते। वास्तव में ये सपने हमारी अज्ञानता की देन होते हैं। तभी तो कहा गया है इग्ोरेंस इा ब्लिस। तभी तो हम दुनिया का सब कुछ पाकर भी बाल्यकाल की अज्ञानता में लौट जाना चाहते हैं।
सोचता हूं जिसे हम अज्ञानता कहते हैं वह हमारे मानस की वह प्राकृत अवस्था है जिसमें शोषण, संचय, अहं, छल-कपट के ज्ञान का समावेश नहीं होता। इधर विकास में ज्ञान हमारे मानस की वह विकृत अवस्था है जिसमें वह ज्ञानपति बन पूंजीपति की राह चल रहा है।
यह राजा है यह रंक है...यह ज्ञान है और दोनों के भेद को न जानना अज्ञान। पर क्या हम यह जानते हैं कि ज्ञान की चरम अवस्था अज्ञान है! इस अवस्था में ज्ञान दोनों में राजा और और रंक से परे मनुष्य को देखता है अर्थात उसमें यह भेद नहीं रह जाता कि यह मनुष्य राजा है यह मनुष्य रंक है। इस तरह ज्ञान का चरम अज्ञान है। इस भेद रहितता को हमारे चिंतकों ने शून्यवस्था कहा है।
आश्चर्य की बात कि जिस भेद युक्त ज्ञान से ही समय जीता है और विकास की ओर बढ़ता है...और भेदों की ओर वह समय की धरोहर नहीं बनता। धरोहर वही ज्ञान बनता है जिसे जीने वाला समय नकारता है।
मेरा शिक्षाकाल कुंभराज, विदिशा, ग्वालियर का। दो वर्ष आगरा का भी, किंतु उस काल में मैं अपने पैरों खड़ा हो गया था। उस समय का मुख्तार मैं खुद था तथापि मैंने इसे बंद में नहीं खुले में जिया जो मेरी जिंदगी का परमोच्च संस्कार-काल कहा जा सकता है।
कुंभराज का शिक्षाकाल बचपन था जिसमें शिक्षा गौण थी। छुट्टी, हाट, पर्व, मेला, भोज ही हमारे कैलेंडर में दिन, वार, महीना थे। खेल, आवारगी, हुड़दंग हमारे लिए दिन था, और दुख इस बात का होता था इस पर माता-पिता का नियंत्रण था। खेत, कुंआ-चरस, बेलें-पेड़, पशु-पक्षी हमारे संगी-साथी थे। हम घड़ी से नहीं बंधे थे। घर पर घड़ी थी ही नहीं। घड़ियाल पर बजते घंटे हमारे लिए बजता समय थे। फिर आकाश का सूरज था। रात ऑंगन में माँ बता सकती थी कि एक का टोल एक बजे का है, साढ़े बारह का या डेढ़ का।
कुंभराज के बसंत-वर्षाकाल से मैं विदिशा के शरद-हेमंत काल में आया। यहाँ आवारगी और हुड़दंग समाप्त। अब खेत-कुऑं संगी-साथी नहीं रहे। हाट, पर्व, मेला रुप में शरद था, पर पढ़ाई के हेमंत की ठिठुरन से भरा हुआ। बालकांड के बाद का अयोध्या कांड। ग्वालियर का शिक्षाकाल पूरी तरह यथार्थ से भरा हुआ था। मौसम की दृष्टि से सर्वथा ग्रीष्म और शिशिर युक्त। कांड में अरण्यकांड। यहाँ हाट, पर्व, मेला कुछ नहीं रहा। हाँ, यहाँ एक बात अच्छी रही कि संगी-साथी अब पुस्तकें बन गयी थीं। तभी कुंभराज जहाँ कल्पना की दुनिया थी, विदिशा भावों की वहाँ ग्वालियर विचार की बनी।
राम के चिंतक रुप का किसी ने विचार नहीं किया। चौदह वर्ष कितने लंबे समय वे अरण्य में रहे, प्रकृति की गोद में। इसमें अवश्य उन्होंने विश्व, प्रकृति और मनुष्य के संबंध में चिंतन किया होगा। वे इस काल में राक्षसों से जूझे, ऋषिमुनियों से मिले और सीता का विरह भी सहा। इन सबने उनके चिंतन को अवश्य ही गहन और व्यापक आयाम दिया होगा। कितना अच्छा होता लक्ष्मण उन्हें कभी जीव-जगत के बारे में छेड़ते। तब होता तो जीवन की एक और गीता हमें विरासत में मिलती। नहीं वाल्मिकी और तुलसी के लक्ष्मण ने यह भूमिका अदा की, आगे के कवियों के लक्ष्मण तो अदा कर सकते थे।
बसंत-वर्षा शरद में समय देखते-देखते गुजर जाता है अनदेखे ही जिंदगी को, इसके विपरीत ग्रीष्म-हेमंत-शिशिर में समय गुजरते नहीं गुजरता और जो नहीं देखना चाहते उससे कितना कुछ देखते हैं हम जिंदगी को। इस अरण्य में इतना तो अवश्य होता है कि हम राम को पहचानने लगते हैं और कहीं चिनगारी जल उठती है कि नहीं हम लक्ष्मण अथवा हनुमान बन सकते, गिलहरी तो बन ही सकते हैं।
कुंभराज, विदिशा और ग्वालियर के शिक्षाकाल को मैं क्रमश: कविता, रेखाचित्र और रिपोर्ताज में विभाजित पाता हूँ। कुंभराज-काल भावपूर्ण प्रकृति के नाना रुपों में ओतप्रोत है। इसमें मन को मोह लेने वाले नाचते मोर हैं, पी-पी करते पपीहे, कुहू-कुहू करती कोयलें हैं, गुटरगूं करते कबूतर और बांग देते मुर्गे हैं। नदी, खेत, फसलें-पेड़, देवी-देवता, उत्सव त्यौहार, हल, गाय-बैल, किसान सब -कुछ हैं और इन सबमें मैं भी हूं। विदिशा का काल गणेशराम और सुरेंद्रनाथ वर्मा जैसे वंदनीय गुरुओं, काशीनाथ पंडित और सखाराम निगुड़कर जैसे गांधी भक्तों तथा वकील दातार और डाक्टर मजुमदार जैसे निस्पृह समाज पुरुषों से ओतप्रोत है। इन रेखाचित्रों में मैं कहीं नहीं हूँ। हाँ, उत्कट दर्शक जरुर हूं। ग्वालियर का काल रिपार्ताज का है। ये रिपोर्ताज नाना घटनाओं से युक्त और वैचारिक भी, पर कविता और रेखांचित्र की मानिंद ये आकर्षित नहीं करते, यद्यपि इनकी वैचारिकता मुझे बहुत कुछ दे जाती हैं। आकर्षित इसलिए नहीं करते कि कोई भी रिपोर्ताज ऐसा नहीं कि बिखरा-बिखरा न हो। अब आगे के काल की बात करुँ।
शिक्षाकाल में हवा में उड़ता समय था अब नौकरी काल में वह जमीन पर उतर आया।
जमीन पर चलते हुए मैंने शीघ्र ही अनुभव किया कि शिक्षाकाल का परीक्षा-भवन अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
यह परीक्षा भवन कहीं भी हाािर-घर बाहर, बाजार में बगीचे में, सभा में संस्था में, सफर में दफ्तर में, अस्पताल में-श्मशान में। जरुरी नहीं कि परचे में सवाल दस हों। एक भी हो सकता है जो दस-दस सवालों के बराबर। इनको सवाल कहना ही ठीक नहीं। दैत्य होते हैं ये दैत्य। इनके उत्तर यदि आप स्थल-काल के अनुरुप नहीं देते, आदर्श मूल्य के अनुरुप देते हैं तो ये दैत्य हमको कच्चा चबा जायेंगे। प्रश्ों के कुछ नमूने ये हैं- हमारी संस्था के अध्यक्ष महोदय मेवाराम एक देवपुरुष हैं। इस कथन को विस्तार से समझाइए। महंगाई, भ्रष्टाचार, अभाव के रहते मेरा देश महान है का जप आप सार्वजनिक स्थलों पर करते हैं या नहीं? विदेशी अंग्रेजी रोटी देती है, देशी हिंदी राष्ट्रीयता देती है। आप इन दो वक्तव्यों में किसे चुनेंगे? नेता, दुकानदार, डाक्टर वकील, अफसर जैसे सफल लोग जेबकतरे के ही जातभाई हैं! इस कथन की सत्यासत्यता पर विचार कीजिए। 'योग्यता, ईमानदारी और देशनिष्ठा-सिफारिश, जातविाद, रिश्वत के यहाँ पानी भरते हैं।' इस उक्ति की सोदाहरण व्याख्या कीजिए। क्या आप साहब और चपरासी को कानून के एक ही तराजू से तौलेंगें? 'भगवान अब मंदिर-मस्जिद में नहीं कोठियों-महलों में रहता है।' इस कथन के परिप्रेक्ष्य में भगवान के स्वरुप पर प्रकाश डालिए।
जैसे-जैसे समय गुजरता गया मैं सवालों के मकड़जाल में उलझता गया। बगीचों में, खेल के मैदानों में, दफ्तरों में, शिक्षा-संस्थाओं में, मंदिरों में सर्वत्र सवाल ही सवाल थे। इन सबसे अलग बाजार के सवाल तो जैसे मुझे चूहों की तरह कुतर रहे थे। सवालों को कुचलने का दम भरने वाली सरकारें, उनकी नीतियाँ और मशीनरी भी सवाल बनती चली गयी-भारी सवाल।
इन्हीं सवालों ने कालांतर से मुझे व्यंग्य लेखक बना दिया। लेकिन लेखन ने भी सवाल खड़े कर दिये। संपादक पुलिस की तरह सीटी बजा कर मुझसे सवाल करते- कौन हो तुम? कहाँ रहते हो? क्या करते हो? ऐसे ही आवारा हो या गिरोह के हो? वे तो मुझसे सवाल कर सकते थे, मैं उनसे नहीं। बड़े तो खैर जाने दीजिए छुटभैये सम्पादकों से भी नहीं। हाँ, ये छुटभैये। इनके पेपरों ने इन्हें प्रतिष्ठित बना दिया हो, अपने आप में ये छुटभैये ही हैं।
लेकिन मुझे अपने पर भरोसा था। अपने समय पर...उस समय पर जिसमें मैं जी रहा था। अजीब होता है समय मुझ जैसे सामान्य की जिंदगी में। रोजमर्रा की जिंदगी में यह भले ही अपना सखा हो, पर रोजमर्रा से हटकर कुछ करें तो कट्टर दुश्मन। यह ऐसा परीक्षक बन जाता है कि मेरी उत्तरपुस्तिका को पढ़ता ही नहीं, बिना पढ़े ही उस पर शून्य अंक दाग देता है। मैं इस पर कुछ कहूँ तो यह चिल्लाता है-चुप! तुम्हें सवाल करने का भी हक नहीं है।
साहित्य जब से नाम-पैसा हो गया है, सफल सात्यिकार डिक्टेटर बन बैठा है। कहें कि साहित्य जब से नाम-पैसा देने लगा है वह राजनीति बन गया है। राजनीति सो उसमें कई दल, नेता, मंत्री, शासन और हाथ मारी।
समय मेरे प्रति कट्टर दुश्मन तो मैं भी समय के प्रति कट्टर दुश्मन। उसे मैं ढीला नहीं छोड़ता, कसकर बांधे रखता हूँ। प्रात: साढ़े चार से रात ग्यारह तक का पल-पल का हिसाब मैं उससे मांगता हूँ-कहीं जरुरत से ज्यादा आराम में, गपशप में, चर्चाबाजी में, यशप्रतिष्ठा-मेलों में, पैसा-प्रशंसा बटोर-समारोहों में तो नहीं गंवा दिया है।
मैं देखता हूँ कि मेरा समय शब्द का अर्थ अर्जित करते-करते बाजारु थे की ओर तो नहीं मुड़ गया है। अर्थ मुझे चाहिए बाजार वाला अर्थ, पर उसे केंद्र में रख शब्द के अर्थ से नहीं। अर्थ की ही बात निकली है तो बताऊँ कि सामान्य जिंदगी का सखा समय मुझसे अनेक समझौते अर्थ के लिए कराता रहा। विदिशा में समय मुझ पर इतना खुश कि यह मुझे टयूशनों के इतने आफर लाता कि मना करते-करते मुश्किल। पैसा भी मुझे मैं जो मांगता वह मिलता।
मेरा अपना समय जिसमें मैं लिखना-पढ़ना, चिंतन करना चाहता था उससे यह सखा समय उलझ पड़ता था और मेरे समय को बुरी तरह दबोच देता था। पैसा मुझे मिल रहा था, पर लग रहा था मेरी जिंदगी स्वतंत्र नहीं टेकू जिंदगी है। टेकू जिंदगी स्पान्सर्ड सीरियल की भांति। सीरियल का स्वरुप ही नहीं उसका अस्तित्व भी स्पॉन्सर वाले पर निर्भर करता है। मैं आठ बजे शाम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्याख्यान को नहीं जा सकता क्योंकि मेरी जिंदगी का यह सीन स्पॉन्सर वाले की लड़की के उस सीन को हटा देता है जिसमें मैं उसे पढ़ाने जाता हूँ। मैं स्टाल से वह अखबार नहीं खरीद सकता जिसमें स्पॉन्सर वाले की तस्करी का समाचार छपा है। यह सीन तो मेरी ही जिंदगी को चैनल से उतारकर रख देगा। विकास के साथ हमारी जिंदगी ऐसी ही टेकू और टेकू होती जा रही है। फिर स्पॉन्सर के विज्ञापन के पीछे इसमें ब्रेक आते हैं सो अलग। ब्रेक फिर हितोपदेश हो, मानवसेवा हो या सीमा रक्षा हो-कहीं भी ब्रेक। स्पॉन्सरों के विज्ञापन दस सेकंड मात्र से कितना मनुष्य-समय निगल रहे हैं प्रतिदिन इसका हिसाब लगाये तो संख्या सालों की बैठेगी।
स्पॉन्सर के विज्ञापन हमें समय की कीमत तो अदा करते हैं पर जीवन मूल्यों की कीमत पर। मेरी तो रोटी ही पीरियड नामी समय में थी। कहने को 45 अथवा 60 मिनट का, पर अनगिनत मिनटों से भरा हुआ। मैं यहाँ एक मिनट भी यदि बरबाद करता हूँ तो कम-से-कम एक घंटा तो करता ही हूँ। और इस बात का मुझे नित्य अहसास रहा।
इने-गिने छात्रों का भविष्य बनाने वाले अध्यापक में तो यह अहसास पाया जाता है, पर देश का भविष्य बनाने वाले सांसदों में नहीं यह कितने खेद की बात है।
अध्यापक का खुद का कोई भविष्य नहीं तब भी अहसास और सांसद अपने आप में भविष्य तब भी अहसास नहीं। जलगांव में मैंने कभी कोई टयूशन नहीं की। हाँ, परीक्षा के पेपर खूब जांचने होते थे। इन पेपरों में से तो अध्यापक छात्रों के भविष्य का फैसला ही करता है। सो यह कितनी जिम्मेदारी का काम! यहाँ भी अध्यापक का कोई भविष्य नहीं। पारिश्रमिक से भविष्य नहीं बनते। मित्र गवांदे कहता था जो भविष्य नहीं बना सकते वे भूत तो बना ही सकते हैं। भूत..इतिहास। इतिहास बनाने वालों ने कभी भविष्य की नहीं सोची, बल्कि भविष्य की कीमत पर ही इतिहास बनते हैं। गवांदे के इस कथन में तथ्य है। भविष्य के पैसा, सत्ता, प्रतिष्ठा आदि को छोड़ हम जो ज्ञान, कौशल्य, कला, मानवता आदि अर्जित करते हैं वह भूत की ही तो विभूति है। समय और पैसा इनके बीच नित्य द्वंद्व होता है और इस द्वंद्व में जीत पैसे की होती है।
पैसे की दस्तक को टाल दो, समय की दस्तक पर कभी ऐसा न करो। यदि तुम समय के गुलाम हो तो समझ लो समय के मालिक हो। नेक आदमी ने कहा, जहाँ तक मेरे समय का सवाल है, मैं तीन कोटि के समय में जीता हूँ-रोटी के, आदमी के और विचारों के। पहला मुझे जिंदा रखता है बदले में मैं उसे श्रम देता हूँ, दूसरा सुख देता है बदले में मैं प्रेम देता हूँ तो तीसरा देता है तृप्ति बदले में मैं आचरण देता हूँ। गरीबों ने कहा, हमारा समय आते-आते ही हमारा समय आ जाता है।
समय के प्रवाह में हलकी नाव डूब जाती है। तुम दुनिया को धोखा दे सकते हो समय को नहीं।
अपने समय में तुम भगवान बना लो या मंदिर ही। पद, पैसा, प्रतिष्ठा, लालसा में से बाहर आओ और देखो समय क्या है!
मैं भविष्य में नहीं भूत में जिया सो मृत्यु से मुझे भय नहीं। कितनी बार मृत्यु ने दस्तक दी पर मुझे व्यस्त देख उलटे पांव लौट गयी।
भूत शराब है...दुनिया की एकमात्र अच्छी शराब, वर्तमान दूध है इसे समय रहते इस्तेमाल करो, भविष्य पानी जिसकी बरसात का सपना मत देखो तुम्हें खुद कुऑं खोदना होगा। इनके करम में गड़बड़ ही आज के समय का रोना है।...कुछ पदचिह्न जो मैंने समय की बालू पर चलते हुए बटोरे। पदचिह्न बालू पर ही बनते हैं दूब पर नहीं।
2 मायादेवी नगर,
जलगांव-2
पिन-425002
सभार - अक्षरपर्व











