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कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती

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कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती
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कुमार विश्वबन्धु

('अज्ञेय' की कहानी 'रोज् ' का पुनर्पाठ)
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' हिन्दी के ऐसे कवि, कथाकार, उपन्यासकार और चिंतक थे, जिन्होंने भारत की औपनिवेशिक स्वतंत्रता के आसपास और उसके बाद, बदलती सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में मूलत: एक स्वतंत्र मनुष्य के रुप में व्यक्ति की आत्म-पहचान, उसकी निजता-विशिष्टता और आत्मिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों को उठाया। इस दृष्टि से 'रोज' उनकी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कहानी है। 'रोज' कहानी का रचनाकाल मई, 1934 ई. है। बाद में लेखक ने इस कहानी का शीर्षक बदल कर 'गैंग्रीनv कर दिया था।


यह एक एकल परिवार की कहानी है। एक घरेलू पत्नी, एक सीधा-सादा नम्र डाक्टर पति और एक साल-डेढ़ साल का बच्चा। इस छोटे से परिवार में मालती घर-गृहस्थी संभालती है। मालती के पति महेश्वर एक पहाड़ी गांव में सरकारी डिस्पेंसरी के डाक्टर हैं। उन्हें क्वार्टर मिला हुआ है। रोज सुबह लगभग सात बजे वे डिस्पेंसरी चले जाते हैं और डेढ़ या दो बजे लौटते हैं। उसके बाद दोपहर भर छुट्टी रहती है। केवल शाम को डिस्पेंसरी के साथ लगे छोटे से अस्पताल में रोगियों को देखने और जरुरी हिदायतें देने के लिए घंटे दो घंटे के लिए जाना पड़ता है। मालती की दिनचर्या भी एक निश्चित परिधि में, निश्चित घरेलू कामों को निपटाते हुए चलती रहती है। सुबह से दोपहर, फिर शाम और रात तक वह जैसे एक ही दिन को बार-बार दुहराती है। पति से पहले सोकर उठना, घर की सफाई करना, पति के लिए नाश्ता तैयार करना, खाना पकाना और उसके बाद बच्चे को संभालते हुए दोपहर तक पति के वापस लौटने का इंतजार करना। पति को खाना खिलाने के बाद खुद जैसे-तैसे खाना खाना। इसके बाद बच्चे की देखभाल करने के साथ शाम के लिए नाश्ता तैयार करना, रात के लिए भोजन बनाना, बर्तन धोना और देर रात सोना। फिर दूसरे दिन, तीसरे दिन, चौथे दिन, हर दिन वही-वही काम करना। लेखक मालती के दूर के रिश्ते का भाई है और उससे मिलने एक दिन अचानक ही उसके घर पहुंच जाता है। लेखक कहता है-'दोपहर में उस घर के सूने आंगन में पैर रखते ही मुझे ऐसा जान पड़ा मानों उस घर पर किसी शाप की छाया मंडरा रही हो, उसके वातावरण में कुछ ऐसा अकथ्य, अस्पृश्य किन्तु फिर भी बोझल और प्रकम्पमय और घना सा फैल रहा था...।'w चूंकि लेखक और मालती खेलते-खाते साथ-साथ बड़े हुए हैं, इसलिए उनके आपसी सम्बंधों में भातृत्व से अधिक मित्रता का भाव रहा है। परंतु अब मालती से मिलकर लेखक महसूस करता है कि शादी के महज तीन-चार सालों में ही मालती के भीतर की सारी नमी जैसे सूख गयी है। इतने दिनों बाद मिलने पर भी उसके भीतर कोई हलचल नहीं होती। उसके मन में कोई भावावेग दिखाई नहीं पड़ता। यहां तक कि वह लेखक से हालचाल तक नहीं पूछती।
'रोज' निम्न मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में एक औसत औरत के जीवन का रोज का यथार्थ है। और यह यथार्थ हम सभी के लिए इतना अधिक जाना-बूझा हुआ, सर्वग्राह्य और स्वाभाविक है कि हमें उसमें कुछ भी विशेष या कि असामान्य दिखाई नहीं पड़ता। कहानी में मालती का जीवन, उसकी रोज की दिनचर्या, कुलमिलाकर एक पत्नी और एक बच्चे की मां के रुप में उसकी छवि वही है, जो आमतौर पर किसी भी निम्न मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में होती है या कि हो सकती है। हम सभी मालती अथवा मालती जैसी औरतों को इसी रुप में देखने के अभ्यस्त हैं। एक पति के रुप में, एक पुत्र के रुप में, एक पिता के रुप में, एक भाई के रुप में और अंतत: एक पुरुष के रुप में, हम मालती के लिए किसी और तरह के जीवन की कल्पना कर ही नहीं सकते। हमारा समाज, हमारी संस्कृति, हमारा धर्म और सर्वोपरि हमारा अति प्राचीन गौरवशाली इतिहास, हमें इसकी इजाजत नहीं देता। वह इजाजत दे भी, तो पर भी हम वैसा नहीं कर सकते, क्योंकि सच तो यह है कि हमें इसका अभ्यास ही नहीं है। लेकिन इस समूचे प्रसंग की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि स्वयं मालती और उस जैसी तमाम औरतें भी अपनी इस छवि की अभ्यस्त हो चुकी हैं और संभवत: इतना ज्यादा अभ्यस्त हैं कि कोई यदि उसमें थोड़ा परिवर्तन भी लाना चाहे तो वे स्वीकार न करें। उनकी स्थिति दरअसल चीन के महान कथाकार लु शून की कहानी 'ज्ञानी, मूर्ख और क्रीतदास'x के उस गुलाम की तरह है जो अपनी कोठरी में एक भी खिड़की के न होने का दु:ख तो सबसे कहता फिरता है, परंतु जब एक व्यक्ति (क्रांतिकारी) उसका कष्ट जानकर उसकी कोठरी की दीवार फोड़कर आनन-फानन में एक खिड़की बनाने लगता है, तो वह बुरी तरह से डर जाता है और घबड़ाकर चीखने-चिल्लाने लगता है। 'रोज' वास्तव में कोई कहानी नहीं है। वह पढ़े-लिखे निम्न मध्यवर्गीय एकल भारतीय परिवार में एक औसत औरत की रोज की जिंदगी है। एक स्टिग्माटाइज स्थिति, जो एक स्तर पर नियति का रुप ले चुकी है। ठीक वैसे ही जैसे हम छोटे-छोटे बच्चों को खेलने-खाने-पढ़ने के स्थान पर काम करते हुए देखने के अभ्यस्त हो गए है। युवा कवि राजेश जोशी लिखते हैं-'कुहरे से ढंकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं सुबह-सुबह बच्चे काम पर जा रहे हैं हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह भयानक है उसे विवरण की तरह लिखा जाना लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह काम पर क्यों जा रहे है बच्चे?' एक अतिपरिचित बार-बार का देखा हुआ दृश्य, जो लगभग हर रोज ही हमारी आंखों से होकर गुजरता है, लेकिन दैनिक अखबार में छपे किसी मामूली विवरण की तरह, जिसे हम रोज पढ़ते हैं और भूल जाते हैं। कवि उसी विवरण को एक सवाल या कि कविता में बदल देता है। रोज कहानी में मालती की जीवन-स्थिति भी जैसे उसकी नियति बन चुकी है, लेकिन उस स्टिग्मा पर 'अज्ञेय' जैसे ही एक प्रश्न चिह्न लगा देते हैं, वैसे ही वह जिंदगी मानो छटपटाकर एक कहानी में बदल जाती है। एक ऐसी कहानी, जिसे पढ़कर हम स्वयं देर तक छटपटाते रह जाते हैं। एक ऐसी कहानी, जिसे पढ़कर हम मालती के भीतर की छटपटाहट को ही नहीं देखते, बल्कि उसके पीछे मौजूद उस अलक्षित तंत्र को भी देख लेते हैं, जो किसी अभिशाप की तरह, किसी अशुभ छाया की तरह पूरे परिवार पर, विशेषकर मालती पर हावी है। यह छाया लेखक को बार-बार दिखाई पड़ती है, वह कहता है' 'यह कैसी छाया इस घर पर छायी हुई है...और विशेषतया मालती पर...।'
लेकिन यह छाया सिर्फ लेखक को ही क्यों दिखाई पड़ती है? मालती का पति महेश्वर लगातार साथ रहते हुए भी उस छाया को क्यों नहीं देख पाता? यह एक बड़ा सवाल है। महेश्वर, जो कि सम्बंध के लिहाज से मालती के सबसे निकट का व्यक्ति है, वह मालती की रोजमर्रा की घुटन और दारुण तकलीफ को नहीं देख पा रहा है। दूसरी तरफ लेखक को इसकी अनुभूति घर में कदम रखते ही हो जाती है? ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लेखक मालती को मित्रता की दृष्टि से देखता है। मित्रता में बराबरी, समानता और सहमर्मिता का भाव होता है। मित्र की दृष्टि वस्तुत: एक जनतांत्रिक दृष्टि होती है। लेखक कहता है 'मालती मेरे दूर के रिश्ते की बहिन है, किन्तु उसे सखी कहना ही उचित है, क्योंकि हमारा परस्पर सम्बंध सख्य का ही रहा है। हम बचपन से इकट््ठे खेले हैं, इकट्ठे लड़े और पिटे हैं, और हमारी पढ़ाई भी बहुत सी इकट्ठे ही हुई थी। और हमारे व्यवहार में सदा सख्य की स्वेच्छा और स्वच्छंदता रही है, वह कभी भ्रातृत्व के, या बड़े-छोटेपन के बन्धनों में नहीं घिरा।'{ जबकि महेश्वर, मालती के साथ जिस रिश्ते में बंधा है, वह पतित्व या कि स्वामित्व का सामंती रिश्ता है, जहां पति मूलत: प्रभू है और पत्नी बुनियादी रुप में उसकी आश्रिता। इसलिए वह प्रेम भी करेगा तो दाता को तरह। वह उस पर दया कर सकता है, कृपा कर सकता है, लेकिन मनुष्य के स्तर पर उससे बराबरी, समानता और मित्रता का नाता नहीं जोड़ सकता। और इसलिए वह उसके दु:ख, उसकी तड़प और उसकी आत्मा की छटपटाहट को आत्मा के धरातल पर अनुभव नहीं कर पाता। 'रोज' वस्तुत: सामंती समाज व्यवस्था द्वारा नियंत्रित उस एकल परिवार की कहानी है जो भारत के नवीन सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया में संयुक्त परिवार के टूटने से अस्तित्व में आया। इस एकल परिवार को संयुक्त परिवार की भीड़-भाड़ या कि अति सामाजिकता से छुटकारा मिला, व्यक्ति स्तर पर जीने की सुविधा और स्वतंत्रता हासिल हुई। परंतु साथ ही इसने सामूहिक जीवन-पध्दति में प्रवहमान सामाजिकता और उत्पादनशीलता खो दी। दूसरी तरफ जीवन-प्रणाली के स्तर पर उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया। संयुक्त परिवार से अलग होकर उसकी अच्छाइयां तो उसके साथ नहीं आ सकी, लेकिन सामंती समाज और परिवार-तंत्र की सारी बुराइयां उसके साथ लगी रहीं। ज्ञान, पैसा और सुविधा के स्तर पर जिंदगी में काफी बदलाव आ जाने पर भी, संस्कार, सोच और व्यवहार के स्तर पर वह पहले जैसा ही बना रहा। तीसरे, औपनिवेशिक पश्चिमी शिक्षा ने उसे पारम्परिक श्रम और उत्पादन से अलगाकर मूलत: असामाजिक और सृजनहीन बना दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो वह औपनिवेशिक औद्योगिक तंत्र के एक उत्पादनहीन मशीनी पुर्जे (गुलाम) में बदल दिया गया। औपनिवेशिक अंग्रेजी सम्राज्यवाद ने यही नहीं कि केवल भारत के पारम्परिक घरेलू उद्योग को अपने फायदे के लिए तहस-नहस कर दिया, बल्कि इसके साथ ही उसने यहां की श्रम-संस्कृति को भी एक सिरे से ध्वस्त कर दिया। अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार भी उसने इसलिए किया, ताकि अपने लिए सस्ते मूल्य पर बौध्दिक मजदूर तैयार कर सके। आजादी के साठ साल बाद भी, हमारे देश का पढ़ा-लिखा तबका, व्यवहारिक स्तर पर वस्तुत: वही बौध्दिक मजदूर है, जो अपेक्षाकृत सस्ते मूल्य पर पश्चिमी देशों के लिए काम करता है। फिर चाहे वह डाक्टर हो कि इंजीनियर, स्कालर हो कि टेक्नीशियन या कि वैज्ञानिक, अंतत: उसकी स्थिति मजदूर गुलामों जैसी ही है। वह पढ़ता तो है देश और देश की जनता के खर्चे पर, लेकिन अपनी सेवाएं देता है पश्चिमी देशों को। भारत में अपने समस्त आधुनिक प्रयत्नों के बावजूद, औपनिवेशिक फायदे के लिहाज से अंग्रेजी साम्राज्यवाद की दिलचस्पी कभी इस ओर नहीं रही, कि भारत की जनता, अपने पारम्परिक सामाजिक गतिरोधों को पार करे। उल्टे कभी छिपे तौर पर, तो कभी खुलकर, उन्होंने यहां के सामंती-तंत्र का पोषण किया और जमींदारी प्रथा को औपनिवेशिक शोषण के स्थानीय औजार में बदल दिया।




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