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'आदमी' दिखाता है जीने की राह

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दिलीप गुप्ते

अभी तक सिर्फ साधु संतों पर फिल्में बनाने वाली फिल्म कंपनी प्रभात ने सामाजिक फिल्म दुनिया ना माने की सफलता के बाद अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म आदमी बनाई। सन 1939 में बनी इस फिल्म का मराठी संस्करण 'माणूस' नाम से भी जारी हुआ था। इस फिल्म ने निर्देशक शांताराम को नई उंचाईयों पर खड़ा किया। उन दिनों दुखांत फिल्में बनती थी। खास तौर पर सारा देश न्यू थियेटर्स की फिल्म देवदास की गिरफ्त था इस फिल्म ने कई नौजवानों को निराशा में डूबो दिया था। न्यू थियेटर्स से प्रभात की प्रतिद्वंदिता जग जाहिर थी। प्रभात देवदास का करारा जवाब देना चाहता था। आदमी के बहाने उसने जीवन जीने के लिए का संदेश दिया। उन्‍होंने एक आम आदमी को फिल्म का नायक बना कर उसके जीवन में आने वाले मुसीबतों, उसके सामाजिक बंधनों को बताया है। आदमी अपने जमाने के बहुत आगे की फिल्म थी। इसने विदेशों में भारत का नाम चमकाया।


फिल्म के टाइटल्स बड़े ही प्रभावशाली है। कीचड़ पर दो जोड़ी पैर चले जा रहे है और कलाकाराें के नाम मिट्टी से बने हुए अक्षरों उभरते है। (इसी को याद रखकर शांताराम ने कई साल बाद अपनी फिल्म गीत गाया पत्थरों ने में चट्टानों पर शीर्षक दिए थे) शीर्षक खत्म होने के बाद फिल्म शुरू होती है। जुए के अड्डे पर रात को अचानक पुलिस का छापा पड़ता है। भगदड़ मच जाती है। एक जुआरी बत्ती बुझा देता है। कुछ जुआरी भाग निकलने में सफल होते है और कुछ पकड़ लिए जाते है। एक जुआरी के हमले से सिपाही मोती (बिल्ला नंबर 255) के हाथ में चोट लग जाती है। इसी कार्रवाई में नाचने वाली केसर मोती के हाथ लग जाती है। वह उस पर अपना ओवरकोट फेंक कर उसे दूसरे पुलिस वालों से बचा कर छोड देता है जब केसर उसके हाथ में चोट लगी देखती है तो अपनी साड़ी फाड़ कर पट्टी बांधती है। दोनों अपने-अपने रास्ते चल देते है। केसर अपने कोठे पर आती है। उसकी गैरहाजरी में दूसरी बाई का गाना सुनने के लिए बैठे लोगों के जैसे ही पता चलता है कि केसर आ गई है तो वे अपने फेंके हुए पैसे समेट कर केसर की खोली की ओर दौड़ते है। केसर बहुभाषी गीत किस लिए कल की बात गाना नाच गा कर उन लोगों का मनोरंजन करती है। यहां चाय वाला छोकरा मन्नु तारारारांप गाता हुआ चाय की प्यालियों को पर एक रख कर लाता है मन्नु का और केसर का भावनात्मक संबंध है दोनों अपनी-अपनी हालत से दुखी है। सब लोगों के जाने के बाद केसर का मामा आता है और उसकी कमाई छीन कर ले जाता है।
इधर सुबह हो रही होती है सड़क पर झाडू लग रहा है। महिलाएं पानी भरने और पानी भर कर लौट रही। मोती अपने घर पहुंचता है जहां उसकी मां प्रभाती गा रही है -जाग जरा। बाद में जब मोती सब्जी मंडी में सब्जी खरीदने जाता हेै तो केसर भी वहां आती है। मोती अपने हाथ पर बांधी पट्टी और केसर की साड़ी का रंग देखकर उसे पहचान जाता है। केसर के आग्रह पर वह चाय पीने उसके कोठे पर जाता है। जब वह लौटने लगता है तो दूसरी कोठे वालियां जान-पहचान रखना का ताना मारती हैं, खोली के बाहर बैठी बुढ़िया भी ही वाक्य कहती है। मोती समझ जाता है कि कोठेवालियों का हश्र क्या होता है। मोती और केसर के बीच मुलाकातें बढ़ने लगती हैं। हर मुलाकात के बाद केसर दीवार पर लकीर खींच देती है। जैसे-जैसे उनकी मुलाकातें बढ़ने लगती है इन लकीराें की संख्या भी बढ़ती जाती है। मोती को मालूम है कि केसर एक नाचने वाली है और इसलिए वह इससे मिलने रात को आता है। एक बार वह केसर से मिलने जाता है तो पाता है कि वह किसी ग्राहक के साथ हंस खेल रही और अपने हाथों से उसे चाय पिला रही है। इस पर उसे गुस्सा आता है और अपने लिए बुलाई गई चाय उसके मुंह पर फेंकता है और उसे तमाचा मार कर बाहर चला आता है। इस पर दोनों में तीखी बस होती है। केसर कहती है कि मोती ही उसके लिए कुछ करे। मोती कहता है दुनिया क्या कहेगी? तो केसर पूछती है क्या मैं दुनिया में नहीं हूं? इस पर मोती को अपनी गलती का अहसास होता है। मोती को केसर से लगाव हो जाता है पर वह सामाजिक बंधनों को भी जानता है। वह केसर को उसकी गंदी दुनिया से निकालता है। केसर और मन्नू मोती के दिलाए किराये के मकान में आते हैं। उन्हें मकान दिलवाने के बाद कई दिनों तक मोती उससे मिलने नहीं आ पाता। केसर उसके इंतजार में मोमबत्ती से टपकती मोम की बूंदों से मोती का बिल्ला नंबर 255 बनाती है। बड़े दिनों बाद मोती उससे मिलने आता है तो एक बार फिर दोनों में बहस होती मगर बाद में सुलह हो जाती है। जब मोती कहता है कि वह दूसरे दिन अपने गांव जाने वाला है तो केसर भी साथ हो लेती है। गांव के लोग दोनों के संबंधों का अनुमान लगा लेते हैं और बात मोती के घर पहुंचती है।
मां के आग्रह से मोती केसर को अपने घर लाता है। मां उसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार लेती है पर केसर के मन में द्वंद्व चलता है। क्या उस भोली भाली औरत को धोखा देना ठीक रहेगा। आंखिर वह सभी को सोता छोड़ भाग निकलती है। इससे मोती का दिल टूट जाता है।
बेकारी से परेशान हो कर मन्नू एक कोठे वाली बाई के लिए पर्दे के पीछे गाता है और बाई उस पर अपने होंठ हिलाती है। रसिक उस पर पैसे लुटाते हैं पर जब भेद खुलता है तो मन्नू को पीट कर अपने पैसे वापस ले लेते हैं। उधर मामा को केसर के नए ठिकाने का पता चलता है और वह शराब के लिए पैसे मांगने आता है। मन्नू उसे बड़ी चतुराई से आईना दिखा कर बाहर का रास्ता दिखाता है। केसर को अब नया ठिकाना ढूंढना है। वह मन्नू को साथ ले कर एक मंदिर में पनाह लेती है। वह मोती को छोड़ तो आई है पर उसे भुला नहीं पाती। वह मन्नू को उसकी ंखैर ंखबर लाने के लिए गांव भेजती है। वह बताता है कि मोती एकदम बावला हो गया है। मोती की हालत ठीक नहीं है पर जैसे ही पुलिस का बैग पाइप बजता है वह भावनाओं पर काबू पा करर् कत्तव्य की ओर भागता है। डयूटी पर होते हुए ही वह केसर के कोठे पर जाता है। इमारत में पुताई हो रही है। वह केसर की खोली में जाता है जहां केसर के कई बार लिखे '255' नंबर पर पुताई करने वाला ब्रश मार देता है। मोती घर आ कर कपड़े धोने लगता है मानो पुरानी यादें मिटा देना चाहता है। निराश होकर आत्महत्या करने वह नदी पर जाता है।
जहां उसका पड़ोसी मेघराज उसे बचाता है। लौटते समय मोती उससे शराब मांगता है। मेघराज शराब की बोतल ले तो आता है पर मोती को जीवन की गुत्थियों से परिचित करवाता है। मोती का दिल बदल जाता है और वह शराब की बोतल फेंक देता है।
मामा के धमकाने पर कि वह मोती को उसका ठिकाना बता देगा, केसर उसे रोकती हैऔर उसके ािद करने पर मार डालती है। पुलिस हत्यारे की तलाश में जुट जाती है। मोती उसे ढूंढ लेता है और भाग जाने को कहता है लेकिन तभी उसका अंफसर आ जाता है और केसर को गिरफ्तार कर लिया जाता है। अदालत उसे काले पानी की साा सुनाती है। केसर मन्नू के मांर्फत मोती को संदेश देती है कि प्रेम के लिए दुनिया मत छोड़ो। इसके बाद मोती को परेड करते हुए दिखाया जाता है। हर दृश्य में उसके गणवेश पर ंफीते बढ़ते जाते हैं जो उसके प्रमोशन की कहानी कहते हैं। इसके साथ ही ंफिल्म ंखत्म हो जाती है।
शांताराम चाहते थे कि एक मामूली आदमी को ंफिल्म का नायक बनाया जाए और इसके लिए उन्होंने साधारण सिपाही को चुना। पहले यह भूमिका संगीतकार बसंत देसाई करने वाले थे। उनका शरीर भी पहलवान जैसा था। बाद में शाहू मोडक को लिया गया। उन्हें बंकायदा पुलिस टे्रनिंग दिलवाई गई। वेश्याओं की खोलियों का भूगोल जानने के लिए शांताराम चोरी-चोरी कई लाल बत्ती वाली बस्तियों में गए। पुलिस वालों के मकान भी देखे और वैसे ही सेट स्टूडियो में तैयार करवाए गए। फिल्म में कई जगह शांतराम की कल्पना का नमूना देखने को मिलता है। दीवार पर लकीरें खींचने का प्रसंग शांताराम की ही पहिले की ंफिल्म 'अगि्कंकण' की याद दिलाता है जिसमें रानी अपना राज्य वापिस लाने की ंकसम भूल न जाए इसलिए हर साल अपने साथ पर जलती सलाख से निशान बनाती है। यहां प्रसंग बदले का था तो 'आदमी' में प्रेम का। निर्देशक ने नाचने वाली के मुंह से एक भी अश्लील वाक्य नहीं बुलवाया। और तो और उसके सिर पर पल्लू भी रखवाया। निर्देशक ने पुलिस के प्रति अपना सम्मान भी बतलाया है। एक प्रसंग में जब मोती केसर और मन्नू को किराये के मकान में ठहराता है और किराया देने की बात करता है तो मकान मालिक कहता है। 'अगर पुलिस पर विश्वास नहीं करुंगा तो दुनिया हंसेगी।' शांताराम को न जाने क्यों मामा रिश्ते से चिढ़ है। अपनी पहिले की ंफिल्म 'दुनिया ना माने' में भी उन्होंने नायिका के मामा को ही खलनायक बताया था, इसमें भी। केसर के कोठे से जब मोती गुस्से में वापिस आता है तो अपने हाथ की पट्टी खोल देता है और जाते जाते दीवार पर एक और लकीर खींच देता है-प्यार में नहीं बल्कि क्रोध में। अंत में अदालत के दृश्यों में कहीं भी डायलॉगबााी नहीं रखी बल्कि खिड़की से अंदर की अदालती कार्यवाही बताई है।

प्रभात की ंफिल्में कड़क मास्टर जी जैसी हुआ करती थी। इस ंफिल्म में शांताराम ने हास्य के कई प्रसंग रखे हैं। मन्नू की पहिचान करने के लिए पहिले उसे न दिखाते हुए कई मंािला कप-प्लेटों को बताया है। वह रसिकों के पैसे भी हाथ में न ले कर पंजे पर लेता है। मोती के अपने पड़ोसी मेघराज से पारिवारिक और दोस्ताना संबंध हैं हालांकि मेघराज उससे उम्र में बड़ा है। मेघराज और उसकी पत्नी का अधेड़ उम्र का प्रेम और उनकी नोकझोंक ंफिल्म में राहत देती है। दोनों में समर्पण की भावना है। जब मेघराज डयूटी से लौटता है और अपनी पत्नी को सोया हुआ देखता है तो खुद ही चाय बनाने लगता है पर बर्तन गिरने की आवाा से पत्नी जाग उठती है और उलाहना देती है। 'क्या मैं मर गई थी जो तुम चाय बना रहे हो?' एक अन्य प्रसंग में मेघराज अपनी बीमार पत्नी को कपड़े धोते देख उसे खींच कर बिस्तरे पर लिटाता है और मोती से कहता है। 'ऐसी औरत से कोई प्यार कर सकता है भला?' पत्नी का पति के प्रति समर्पण का भाव तब नार आता है जब मेघराज बिना चप्पल पहने परेड करता है और उसकी पत्नी आ कर उसके पैरों में चप्पल पहिनाती है। वेश्याओं का पूजा करते करते आपस में झगड़ना और इस झगड़ने के शोर में मोती और केसर के संवाद गुम हो जाना पूजा के पाखंड पर अच्छा प्रहार है। लेकिन विनोदी प्रसंग में भी शांताराम ने न्यू थियेटर्स पर छींटाकशी करने का मौंका नहीं छोड़ा। एक अनावश्यक प्रसंग में मोती और केसर के गांव जाते समय हो रही ंफिल्म की शूटिंग के बहाने उन्होंने न्यू थियेटर्स के अतिप्रिय शब्द 'प्रेम' की खिल्ली उड़ाई। 'चंडीदास' के गाने 'प्रेम नगर में बनाऊंगी घर मैं' में 'प्रेम' शब्द 45 बार गाया गया है। इसी को निशाना बनाकर 'आदमी' में ' प्रेम नगर में जाएं' गाने में 'प्रेम का आटा-चावल, प्रेम के पत्थर, प्रेम का चूल्हा बनाएं... प्रेम की रोटी, प्रेम की चटनी' शब्द भरे हैं। मुंशी आीज के संवाद कांफी प्रभावशाली हैं। पुलिस वालों की मुफ्तंखोरी की आदत को ध्यान में रख कर केसर मोती के बारे में कहती है 'चाय के लिए भी नहीं आया पुलिस वाला।' मोती केसर से प्रेम तो करता है पर सामाजिक बंधन उसे खुलकर कहने नहीं देते। इसीलिए वह केसर से कहता है। 'दुनिया क्या कहेगी?' इस पर केसर उल्टा सवाल करती है। 'क्या मैं दुनिया में नहीं हूं?' मोती अपनी मजबूरी णाहिर करते हुए कहता है। 'आंखिर आदमी हूं, दुनिया की परवाह करनी ही चाहिए।' वह केसर से मिलने रात को ही आ पाता है। जब वह उसे किराये का मकान दिलवा कर विदा चाहता है तो कहता है। 'जाता हूं। उजाला होने को है। शाम को आऊंगा, अंधेरा होने पर।' और मेघराज का समझाना तो बहुत ही मार्के का है। एक औरत के लिए जान देने की तैयारी करने वाले मोती को वह उसके पिता का उदाहरण देता है जो अब दुनिया में नहीं है। उसकी मां की मिसाल देता है कि वह अपने पति के साथ नहीं मरी। 'तू आदमी है, यह मत भूल।' केसर का अंतिम संदेश 'प्रेम के लिए दुनिया मत छोड़ो' तो बहुत ही प्रेरणादायी है।

संगीतकार कृष्णराव फुलंबीकर का संगीत ठेठ महाराष्ट्र का है। सुंदरबाई के गाए भजन मधुर तो हैं ही पर जीवन का रहस्य भी समझाते हैं। 'मन पापी भूला कौन इसे समझाए' उम्दा रचना है। और बहुभाषी गीत 'अब किसलिए कल की बात' की तो बात ही निराली है। इसमें गुजराती, बांग्ला, तेलुगू, पंजाबी और तमिल भाषाएं इस्तेमाल की गई हैं। शाहू मोडक की आवाा में दम नहीं होने के कारण उनका अभिनय कमाोर हो गया है। युगल गीत में वह शांता हुबलीकर के मुकाबले फीके रहे। शांता हुबलीकर ने गुस्सैल और मजबूर महिला का चरित्र बखूबी निभाया है। मोती के घर उनका द्वंद्व देखते ही बनता है। उन्हें गायन कला का अतिरिक्त फायदा मिला है। मेघराज के रुप में बुवा साहेब और मां की भूमिका में पहले से ही प्रसिध्द हो चुकी गायिका सुंदरबाई ने उस समय की 'सब लोग अच्छे हैं' के विचार वाली मां की भूमिका सफलता से साकार की है। मन्नू की भूमिका में राम मराठे ने खुलकर अभिनय किया है। जब वह पहिली बार शांताराम से मिले थे तब उनकी जुल्ंफें वैसी ही थीं जैसी कि ंफिल्म में बताई गई है। 'बरजोरी कर के सैंयां ने' गीत उन्हीं ने गाया है। मोती की नटखट भांजी बनी मंजु ने प्रभात की कई ंफिल्मों में बाल भूमिका निभाई है। मेघराज की अनपढ़ पत्नी के किरदार में गौरी जंची हैं। वह वैसे भी एकदम अनपढ़ थीं पर अभिनय में बहुत आगे थीं।
'आदमी' ंफिल्म अपने समय के समाज की कहानी कहती है। आज वेश्या विवाह पर कोई बवाल खड़ा नहीं होता, पर उस ामाने में यह बात कल्पना से परे थी। शायद इसीलिए शांतराम ने केसर और मोती की शादी नहीं बताई। 'आदमी' ने न केवल प्रभात की शान बढ़ाई बल्कि वेश्याओं के दुख दर्द समझने वाली पहिली ंफिल्म होने का सम्मान भी पाया।

-अजीत टेरेस 50बी, बख्तावर
राम नगर, इंदौर 452018

सभार - अक्षरपर्व

 

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