बराक ओबामा ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में एक विज्ञापन के जरिए राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी को घेरा है। इस विज्ञापन में भारत का नाम लेकर कहा गया है कि जब रोमनी गवर्नर थे, तब उन्होंने भारत को काफी नौकरियां आउटसोर्स की थीं। इसको लेकर भारत में नाराजगी पैदा हो गई है। ऎसा लग रहा है कि ओबामा प्रशासन की तरफ से यह एक "एंटी इंडिया" विज्ञापन है। इस बारे में सही और गलत समझाने के लिए मैं कुछ बातें बताना चाहूंगा।
सामयिक
एक विज्ञापन से खड़े हुए सवाल
- Monday, 07 May 2012
- News Desk
क्या भारत के मतदाता ऎसे हैं?
- Thursday, 03 May 2012
- News Desk
जरूरत से ज्यादा बोलना व्यक्तिगत जीवन में जितना आपदाजनक हो सकता है, उससे ज्यादा सार्वजनिक जीवन में। अन्ना हजारे की एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि वे इस बात को बिलकुल नहीं समझते। समस्या तब और नाजुक हो जाती है, जब वे जरूरत ही नहीं, बल्कि औचित्य की सीमा से भी ज्यादा बोल जाते हैं। तब न केवल उनकी समझ पर संदेह होने लगता है, बल्कि उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर भी प्रश्नचिन्ह मंडराने लगते हैं। उनके इस बड़बोलेपन के कारण उनके आंदोलन के सामने तरह-तरह की दिक्कतें भी पेश आई हैं। फिर भी उनकी साख बनी हुई है, तो इसीलिए कि उनका चरित्र बेदाग है, लेकिन सिर्फ चरित्र के बल पर व्यक्तित्व की समस्याओं से कब तक पार पाया जा सकता है।
लोकतंत्र में विधायक की साख
- Friday, 27 April 2012
- News Desk
भारत में लोकतंत्र का इतिहास, संसदीय व्यवस्था की शुरूआत, संस्थागत विस्तार एवं विकास की लम्बी यात्रा संघर्ष और सीख की एक अद्भुत कहानी है। अद्भुत इसलिए कि विश्व में अनेक विकासशील देशों ने लोकतंत्र को अंगीकार किया, लेकिन स्थाई सफलताओं से दूर रहे। भारत इसका अपवाद रहा है। यहां विश्व का सबसे बड़ा जीवित लोकतंत्र है। संवैधानिक गणतंत्र है। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा सरकार का निर्माण और संचालन होता है। लोकतंत्र के विस्तार और विकास की लम्बी यात्रा ने कई संसदीय व्यवस्थाओं और संस्थाओं को जन्म दिया है, पाला-पोसा है।
फूल और कांटे
- Tuesday, 31 May 2011
- News Desk
तकदीर का है फैसला तो क्या करे
वो हो नहीं सकते अपने तो क्या करे
फूल खिलते है बाग़ में
सजते है पंडाल में तो क्या करे
फूल खिलते है तो खिलते ही रहेंगे जिन्दगी में
कभी न कभी तो अच्छे लोग मिलते रहेंगे
हम तो वो काटें है जो करते है हिफाजत फूलो की
पर फूलो की बदकिस्मती है
की वो सजते है किसी और के बालो पर
हमने अपना फर्ज निभाया
काँटा बनकर उनको मुसीबतों से बचाया
पर जब छोड़ा साथ फूल ने कांटे का
तो फूल ही जिन्दगी में अकेला होकर मुरझाया
और कांटे ने तो फिर भी किसी और को ही बचाया
नवदीप चतुर्वेदी, कानपूर
रेत के टीलों में
- Friday, 08 April 2011
- News Desk
रेत के टीलों पर
जाने का मन हुआ तो
पहुँच गया मगर
कुछ कंकालों को देखकर
लगा कि -
कितना बड़ा सच हमारे सामने
अचानक सा आ जाता हैं !











