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सामयिक

एक विज्ञापन से खड़े हुए सवाल

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बराक ओबामा ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में एक विज्ञापन के जरिए राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी को घेरा है। इस विज्ञापन में भारत का नाम लेकर कहा गया है कि जब रोमनी गवर्नर थे, तब उन्होंने भारत को काफी नौकरियां आउटसोर्स की थीं। इसको लेकर भारत में नाराजगी पैदा हो गई है। ऎसा लग रहा है कि ओबामा प्रशासन की तरफ से यह एक "एंटी इंडिया" विज्ञापन है। इस बारे में सही और गलत समझाने के लिए मैं कुछ बातें बताना चाहूंगा।

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क्या भारत के मतदाता ऎसे हैं?

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जरूरत से ज्यादा बोलना व्यक्तिगत जीवन में जितना आपदाजनक हो सकता है, उससे ज्यादा सार्वजनिक जीवन में। अन्ना हजारे की एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि वे इस बात को बिलकुल नहीं समझते। समस्या तब और नाजुक हो जाती है, जब वे जरूरत ही नहीं, बल्कि औचित्य की सीमा से भी ज्यादा बोल जाते हैं। तब न केवल उनकी समझ पर संदेह होने लगता है, बल्कि उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर भी प्रश्नचिन्ह मंडराने लगते हैं। उनके इस बड़बोलेपन के कारण उनके आंदोलन के सामने तरह-तरह की दिक्कतें भी पेश आई हैं। फिर भी उनकी साख बनी हुई है, तो इसीलिए कि उनका चरित्र बेदाग है, लेकिन सिर्फ चरित्र के बल पर व्यक्तित्व की समस्याओं से कब तक पार पाया जा सकता है।

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लोकतंत्र में विधायक की साख

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भारत में लोकतंत्र का इतिहास, संसदीय व्यवस्था की शुरूआत, संस्थागत विस्तार एवं विकास की लम्बी यात्रा संघर्ष और सीख की एक अद्भुत कहानी है। अद्भुत इसलिए कि विश्व में अनेक विकासशील देशों ने लोकतंत्र को अंगीकार किया, लेकिन स्थाई सफलताओं से दूर रहे। भारत इसका अपवाद रहा है। यहां विश्व का सबसे बड़ा जीवित लोकतंत्र है। संवैधानिक गणतंत्र है। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा सरकार का निर्माण और संचालन होता है। लोकतंत्र के विस्तार और विकास की लम्बी यात्रा ने कई संसदीय व्यवस्थाओं और संस्थाओं को जन्म दिया है, पाला-पोसा है।

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फूल और कांटे

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तकदीर का है फैसला तो क्या करे
वो हो नहीं सकते अपने तो क्या करे
फूल खिलते है बाग़ में
सजते है पंडाल में तो क्या करे
फूल खिलते है तो खिलते ही रहेंगे जिन्दगी में
कभी न कभी तो अच्छे लोग मिलते रहेंगे
हम तो वो काटें है जो करते है हिफाजत फूलो की
पर फूलो की बदकिस्मती है
की वो सजते है किसी और के बालो पर
हमने अपना फर्ज निभाया
काँटा बनकर उनको मुसीबतों से बचाया
पर जब छोड़ा साथ फूल ने कांटे का
तो फूल ही जिन्दगी में अकेला होकर मुरझाया
और कांटे ने तो फिर भी किसी और को ही बचाया



नवदीप चतुर्वेदी, कानपूर

रेत के टीलों में

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रेत के टीलों पर
जाने का मन हुआ तो
पहुँच गया मगर
कुछ कंकालों को देखकर
लगा कि -
कितना बड़ा सच हमारे सामने
अचानक सा आ जाता हैं !

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झारखंड

राँची

जमशेदपुर

धनबाद

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