राम चरित मानस की रचना कर भगवान राम के पावन चरित्र को विश्वव्यापी बनाने वाले संत गोस्वामी तुलसी दास को मनहूस मान कर घर से निकाल दिया गया था, लेकिन अब बचे धरोहर पर उनकी 11वीं पीढी गौरवान्वित है। उत्तर प्रदेश में चित्रकूट के राजापुर में तुलसीदास की जन्मस्थली में आज भी उनके हाथ का लिखा राम चरित मानस ग्रंथ का एक भाग अयोध्या कांड सुरक्षित है जिसके दर्शन के लिये पूरी दुनिया से लोग आते हैं। तुलसीदास की 11वीं पीढी के लोग एक धरोहर की तरह संजो कर रखे हुए हैं।
कभी अपने परिवार से ही उपेक्षित कर दिये गये अबोध राम बोला आज पूरे विश्व में भगवान की तरह पूजे जाते हैं। तुलसीदास का जन्म राम की ही तपस्थली चित्रकूट के राजापुर कस्बे में आत्माराम नाम के एक गरीब ब्राह्मण के परिवार में संवत पंद्रह सौ चौवन में हुआ था। जन्म के समय से ही तुलसी विलक्षण थे। रोने की बजाय इनके मुंह से राम राम निकला था और जन्म के समय से ही इनके मुंह में पूरे बत्तीस दांत मौजूद थे। तुलसी के बचपन का नाम राम बोला रखा गया। इनके जन्म के कुछ ही दिनों बाद मां हुलसी देवी का देहांत हो जाने के कारण तुलसी को मनहूस समझ कर इनके पिता ने घर से निकाल दिया। घर से निकाले जाने के बाद इनके पड़ोस में रहने वाली चुनिया नाम की महिला तुलसी का पालन पोषण करने लगी।
तुलसी अभी पांच वर्ष के ही थे की उनकी भेंट संत नरहरिदास से हो गयी। नरहरिदास तुलसी को अपने आश्रम ले आये और दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। चित्रकूट में रहकर तुलसी ने अपने गुरु नरहरिदास से विद्या अध्ययन किया और फिर शास्त्रों के गहन अध्ययन के लिए वे काशी चले गये। गुरु की कृपा से तुलसी प्रकांड विद्वान बने और घूम घूम कर राम की कथाओं पर प्रवचन करने लगे। तुलसी की विद्वता से प्रभावित हो दीनबंधु पाठक ने अपनी पुत्री रत्नावली की शादी का प्रस्ताव तुलसी के सामने रखा। तुलसी की शादी उनकी जन्मस्थली राजापुर के पास ही महेवा ग्राम में दीनबंधु पाठक की सुपुत्री रत्नावली से हो गयी।
यमुना के इस पार तुलसी रहते और उस पार रत्नावली। एक बार जब रत्नावली अपने मायके में थी तब तुलसी उनके वियोग में इस कदर पागल हुए कि रात के समय भयंकर बाढ़ में बह रही यमुना में बहे जा रहे एक शव के सहारे ससुराल पहुंच गये। आधी रात में ससुराल पहुंचे तुलसी के बार-बार पुकारने पर भी जब किसी ने उनकी आवाज़ नहीं सुनी तो वे खिड़की से लटक रहे सांप को रस्सी समझ कर ऊपर चढ कर कमरे में सोई हुई रत्नावली के पास पहुंच गये। अपने ऊपर तुलसी की ऐसी आसक्ति देखकर रतना इतनी व्यथित हुई की उन्होंने तुलसी को झिड़कते हुए डांट लगाई।
‘अस्थि चर्म मय देह मम तामें ऐसी प्रीत ऐसी जो श्री राम मह होत न तय भव भीति’ रत्ना के इन शब्दों ने जैसे मोह निद्रा में सोए हुए तुलसी को जगा दिया। उस दिन से तुलसी का सिर्फ एक ही मकसद रह गया। इस दुनिया के रिश्ते नातों को छोड़ भगवान राम के साथ एकाकार होना। अब तुलसी नारी शरीर का मोह त्याग परमात्मा से अपने दिन की लगन जोड़ने लगे। अपने आराध्य राम को खोजते तुलसी तीर्थों में भटकने लगे लेकिन उन्हें राम कहीं नहीं मिले।
निराश हो तुलसी एक बार फिर राजापुर लौट आये। किवदंती है कि राजापुर में तुलसी जब शौच को जाते तो लौटते समय लोटे में बचा पानी रास्ते में पड़ने वाले एक बबूल के पेड़ में डाल देते। इस पेड़ में एक जिन्न रहता था। तुलसी द्वारा रोज जल डालने से वह प्रसन्न हो गया और एक दिन तुलसी के सामने प्रकट होकर उनसे उनकी मनोकामना पूछी। तुलसी ने राम के दर्शन की लालसा बताई तो जिन्न ने कहा कि राम से मिलने के लिए हनुमान के दर्शन जरूरी है और उन्हें हनुमान राम कथा में मिलेंगे। जब तुलसी दास ने पूछा की हनुमान को कैसे पहचाना जा सकता है तब जिन्न ने बताया कि जो व्यक्ति राम कथा में सबसे पहले आये और सबसे बाद में जाये बस उनके पैर पकड़ लेना वो हनुमान ही होते हैं। राजापुर में हुई एक राम कथा में तुलसी ने ऐसा ही किया और जब हनुमान से उनकी भेंट हुई तो हनुमान ने तुलसी को चित्रकूट जाकर वहीं निवास करने को कहा।
राम से मिलने की आस में तुलसी एक बार फिर चित्रकूट आ गये और अपने ईष्ट के दर्शनों की प्रतीक्षा करने लगे। तुलसी चित्रकूट में अपनी कुटिया में रहते मन्दाकिनी तट में बैठ प्रवचन करते और राम के इन्तजार में समय बिताने लगे।
एक दिन जब तुलसीदास चित्रकूट में मन्दाकिनी नदी के किनारे बने चबूतरे में बैठे प्रवचन कर रहे थे तब भगवान राम और लक्ष्मण वहां से गुजरे, लेकिन तुलसी उन्हें पहचान नहीं आये। उसी रात तुलसी को सपने में हनुमान ने दर्शन दिया और उनसे इच्छा पूरी होने के बारे में पूछा तो तुलसी ने कहा कि उन्हें तो किसी के दर्शन नहीं हुए। तब हनुमान ने तुलसी से कुछ दिन और इंतजार करने को कहा। थोड़े दिनों दिनों बाद जब तुलसी एक दिन उसी चबूतरे में बैठे चन्दन घिस श्रद्धालुओं को लगा रहे थे तभी भगवान राम लक्ष्मण और सीता सहित वहां आये और तुलसी दास से चन्दन लगवाने लगे। तुलसी कहीं फिर न चूक जाएं इसलिए हनुमान तोते के रूप में बोले, 'चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीड़ तुलसी दास चन्दन घिसे तिलक देत रघुबीर'। इस तरह हनुमान जी की कृपा ने तुलसीदास को चित्रकूट में राम लक्ष्मण के दर्शन कराये। अपनी इच्छा पूरी होने के बाद तुलसी फिर तीर्थयात्रा पर चल पड़े।
संवत सोलह सौ इकतीस में सत्तर वर्ष की उम्र में तुलसी दास ने हनुमान की प्रेरणा से राम के चरित्रों को दुनिया के सामने रखने के लिए एक ग्रन्थ लिखने का निश्चय किया और दो वर्ष सात माह और छब्बीस दिनों की मेहनत राम चरित मानस के रप में अगहन शुल्क सप्तमी संवत सोलह सौ तैंतीस में दुनिया के सामने आई। तुलसी के इस ग्रन्थ ने राम को घर-घर पहुंचा दिया। हर कहीं राम चरित मानस की चर्चा हो रही थी। यह चर्चा चोरों ने भी सुनी और उन्होंने यह ग्रन्थ चुराकर मालामाल होने के इरादे से राम चरित मानस चोरी कर ली। चोर यमुना पार कर पाते इससे पहले ही चोरी का पता चल गया और नाव से भाग रहे चोरों का पीछा किया गया। इससे पहले की लोग चोरों तक पहुंच पाते उन चोरों ने राम चरित्र मानस की पोटली यमुना में फेंक दी।
यमुना में पोटली को ढूढ निकालना बेहद मुश्किल था। इसे खोजने के लिए काफी बड़े जाल का इस्तेमाल किया जा रहा था फिर भी पोटली को ढूढने में काफी वक्त लग गया अथक प्रयास के बाद राम चरित्र मानस की पोटली यमुना से निकाली जा सकी। घंटों पानी में पड़े रहने के कारण इस महान ग्रन्थ के ऊपर और नीचे के पृष्ठ गल गये। तुलसी की जन्मस्थली राजापुर में आज भी उनके हाथों लिखे गये इस ग्रन्थ का एक भाग 'अयोध्या काड' सुरक्षित रखा है जिसके दर्शन करने पूरे संसार से लोग यहां आते हैं।
सभार - जोश 18








