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आलेख

बिन बायो डेटा सब सुन

आजकल हर तरफ बायोडेटा की बयार बह रही है । हर ऐरा, गैरा, नत्थूखैरा, नूरा-फकीरा, जमालिया, गंगू तेली और राजा भोज एक अदद बायोडेटा लेकर शहर में घूम रहा है । हर तरह के बायोडेटा बाजार में तैयार है । पुराना सिद्धान्त है डिमाण्ड और सप्लाई । सो चारों तरफ से बायोडेटा की सप्लाई आ रही है और जैसा कि आप जानते है एप्लाई-एप्लाई नो रिप्लाई विद आऊट सप्लाई ।  सो हजूर पाठकान आज बायोडेटा पर ही यह चिन्तन प्रस्तुत है ।

तुलसीदास पर गौरवान्वित है उनकी पीढ़ी

राम चरित मानस की रचना कर भगवान राम के पावन चरित्र को विश्वव्यापी बनाने वाले संत गोस्वामी तुलसी दास को मनहूस मान कर घर से निकाल दिया गया था, लेकिन अब बचे धरोहर पर उनकी 11वीं पीढी गौरवान्वित है। उत्तर प्रदेश में चित्रकूट के राजापुर में तुलसीदास की जन्मस्थली में आज भी उनके हाथ का लिखा राम चरित मानस ग्रंथ का एक भाग अयोध्या कांड सुरक्षित है जिसके दर्शन के लिये पूरी दुनिया से लोग आते हैं। तुलसीदास की 11वीं पीढी के लोग एक धरोहर की तरह संजो कर रखे हुए हैं।

सोने की मछली और भगवान बुद्ध

स्‍वामी आनंद प्रसाद 'मनसा'

बात उस समय की है, जब भगवान बुद्ध श्रावस्‍ती में विहरते थे। श्रावस्‍ती नगर के पास केवट गांव के कुछ मल्‍लाहों ने अचरवती नदी में जाल फेंककर कर एक स्‍वर्ण-वर्ण की अद्भुत मछली को पकड़ा। कहानी कहती है अचरवती नदी.....जो चिर नहीं है......अचिर यानि क्षणभंगुर है। ऐसा ही तो जीवन है, प्रत्‍येक प्राणी क्षण-क्षण बदलते प्रवाह के संग-साथ जाता है और पकडना चाहता है। जाल फेंक कर बैठे है, अचरवती के किनारे, कोई पद का, यश का, धन का, नाम का......की मछली को पकड़-पकड़ को कहां पकड़ पाता है। कास हम समझ जाते ये जीवन क्षण भंगुर है।

नया गांधी : अन्ना हजारे

जन लोकपाल के लिए किसी भी राजकीय दल के बगैर आदरणीय अन्ना हजारे ने अपने बलबूते पर पूरे देश को भ्रष्टाचार के खिलाफ़ खडा कर दिया हैं। यह घटना सामान्य नहीं हैं, क्यूंकि किसी का भी खून बहाए बिना जबरजस्त क्रांति की मशाल लेकर अनशन पर बैठे अन्ना ने सभी राजकीय दलों की निंद उड़ा दी हैं। कांग्रेस की अधिष्ठाता मानी जाती सोनिया गांधी को मजबूरन ये बयान देना पडा कि भ्रष्टाचार की इस मुहिम में मैं भी अन्ना के साथ हूँ और उनकी मांग जायज़ हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी यह जीत हैं। गांधी के रूप में जनता को एक ही माला में पिरोने की ताक़त आज भी गांधीगीरी में हैं तो खुद गांधी को हम कैसे नज़र अंदाज़ करेंगे ?

ज़िन्दगी संघर्ष, मंजिल दूर पर हम पाएंगे

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर

ज़िन्दगी संघर्ष, मंजिल दूर है, दम भर ज़रा
सांस लेकर फिर चलेंगे हौसला हममें भरा
दूर है, मुश्किल है, संभव है ये हम बतलायेंगे
रौशनी की एक किरण को थामे सुबह लायेंगे

मेरे देश का क्‍या हाल हो गया

निशा कुमारी

ये मेरे देश का क्‍या हाल हो गया
गरीबी से मेरा देश बेहाल हो गया
महंगाई से जनता कर रही हाहाकार
युवकों को बेरोजगारी से बुरा हाल

तहजीब के आगे दुनिया की सारी दौलत उस्ताद को लगी फीकी

अमेरिका के न्यूर्याक का वर्ल्ड म्यूजिक इन्स्टीच्यूट हो, या केनस का आर्टस फेस्टिवल, ओसाका का ‘ट्रेड फेयर' हो या फिर ईरान के गणतंत्र का ‘तालार मौसिकी', अफगानिस्तान, ईराक, पश्चिम अफ्रिका, सोवियत संघ, हांग-कांग सहित दुनिया के अधिकांशतः देशों के संगीत प्रेमी डुमरांव के लाल उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई के संगीत लहरियों के आनन्द की अनुभूति से सराबोर हो चुके हैं, फिर भी प्यासे के प्यासे। जीवन की संध्या तक दुनिया के कोने-कोने से खां साहब को आमंत्रण प्राप्त होते रहे। सिर्फ शहनाई बजाने के लिए ही नहीं बल्कि विदेशों में बसने के लिए अरबपतियों के प्रस्ताव आते रहे।

अधूरी कोशिश : सुनील

 
बहुत पुरानी कहावत है, ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’। खाद्य सुरक्षा कानून के सामने आए मसौदे के बारे में यही कहा जा सकता है। हालांकि पिछले दो वर्षों से इसे तैयार करने की कवायद चल रही थी। सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में शामिल होकर ज्यां द्रेज, हर्ष मंदर, अरुणा रॉय जैसे दिग्गज बुद्धिजीवी और समाजसेवी इसे तैयार करने में जुटे हुए थे। उधर देश के एनजीओ की पूरी जमात भी ‘भोजन के अधिकार का अभियान’ के बैनर तले इसे दुरुस्त करने में लगी हुई थी। इस सबके बावजूद संसद में पेश किए जाने तक इस कानून को हलका किया जा सकता है। वनाधिकार कानून के मामले में भी यही हुआ था।

हिन्दी गाल का सौंदर्यात्मक यथार्थ


अनिरुध्द सिन्हा

सच पूछिए तो भाषा की भी कुछ जिम्मेदारियों होती हैं। लेकिन आज औपनिवेशिक मानसिकता ने भाषा के विविध स्वरूपों का चिंतन छोड़ दिया है। भाषा की एकरसता ने पठनीयता की नकारात्मक वैचारिक, भावात्मक एवं प्रतिवादी भूमि तैयार की है। पाठकों का खिंचाव साहित्य से कम होता चला गया। हिन्दी कविता तो इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रत्युत्तर में भले वाहवाही के सपने तो देख सकते हैं। ामीन तैयार नहीं कर सकते। भाषा के शब्द गुम होने लगते हैं तब भाषा के संस्कार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगते हैं। भाव और रूप का सुन्दर सामंजस्य कलात्मक भाषा से ही संभव है। भाषा की कलात्मकता बौध्दिक अभ्यास से संभव नहीं है। सौंदर्य के प्रति अपने सरोकारों की प्रवृत्तियों के बारे में भी सोचना पड़ता है। भाषायी शब्दों के दर्शनबोध के संपर्क में आने से पूर्व रागतत्व और बुध्दित्व को रेखांकित करना होगा। आधुनिक हिन्दी साहित्य की प्रकृति में परिवर्तन के लिए आवश्यक भी है।

यादों के चिरांग

हनुमंत मनगटे

अदीब जानता था, मोंतेजुमा ने उससे जो कहा था-प्रमथ्यु! तुमने तुलसी के पौधे की दाहिनी दिशा में पाताल के अंतिम तल तक पहुंचने का जो जलमार्ग बताया था, गिलगमेश उस पर बहुत आगे बढ़ गया है। वह किसी भी समय स्वप् नगरी पहुंच सकता है। वहां पहुंचते ही वह धन्वन्तरि शुरुप्पक के जिउसुद्दु को जरुर तलाश लेगा। अदीब घर-5116 इरोस गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली के करीब पहुंच रहा था। कार में बगल में गायत्री अर्धांगिनी, कार ड्राइव करता ड्रायवर और तभी एकाएक सांस की गति में अवरोध। दाहिना हाथ एक ब एक गायत्री के कांधों पर और सिर कांधे से होता हुआ सीने के पास गायत्री के दिल पर। गायत्री के दिल की धड़कनों की गति से निर्मित असामान्य स्थिति। उत्तेजना में ईना की चीख और गिलगमेश की मनुष्य की पीड़ा, दुख, यातना, भय और मृत्यु से उसे उन्मुक्त करने की आवाज गूंजने लगी- मैं पीड़ा से लड़ूंगा यातना सहूंगा-कुछ भी हो मैं अपने मित्र और मनुष्य मात्र के लिये मृत्यु को पराजित करुंगा।

उत्तेजना के नये द्वीपों की तलाश

पुष्पपाल सिंह

नयी शती में वैश्वीकरण की तीव्र प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभाव हम पर भूमंडलीय अपसंस्कृति के आक्रमण का पड़ा। अपसंस्कृति के पसारे की यह प्रक्रिया एक अंधड़ के रुप में आयी जिसमें हमारे पैर बुरी तरह उखड़ गए, हमने अपनी जमीन पांवों के नीचे से खो दी। फलत: सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में हम पूरी तरह 'अमेरिकी' हो कर रह गए। अमेरिकीकरण की इस प्रक्रिया में जहां अनेक कारक थे, वहीं टी.वी. चैनलों और पैप्सी तथा कोकाकोला कल्चर ने हमें एक नयी सभ्यता और सांस्कृतिक संक्रमण की प्रक्रिया में ला खड़ा किया। कहा जाता है कि यदि पहले इंग्लैंड ने अपना औपनिवेशिक विस्तार 'बाइबल' और विज्ञान के द्वारा किया तो आज अमेरिका ने यह सौ-सौ चिंग्घाडते टी.वी. चैनलों और पैप्सी, कोकाकोला तथा मैक्डोनल आदि के द्वारा किया। इनमें सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज हमारा समाज टी.वी. संस्कृति के माध्यम से काम (सैक्स), कामुकता (सैक्सुअल्टी) तथा उत्तेजक (हाट) की तलाश नित नए रुपों में कर रहा है, इस बात को ताजा उदाहरणों से भली प्रकार समझा जा सकता है।

 

लोकतंत्र की अर्ध्दरात्रि

सर्वमित्रा सुरजन

औपनिवेशिक काल के दर्दनाक इतिहास के बाद जब भारत और उसके बाद तीसरी दुनिया के देशों ने जब आजादी हासिल की तो इसे शोषितों के लिए उम्मीद की नई किरण, गुलामी से मुक्ति की नई सुबह जैसी सुंदर संज्ञाएं दी गईं। 14 अगस्त की मध्यरात्रि को दिया गया पं. नेहरू का भाषण लोकतंत्र की स्थापना के लिए एक नजीर की तरह पेश किया जाता है। अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि आधी रात को जब दुनिया सो रही है तब भारत एक नई जिंदगी और आजादी के लिए जाग रहा है। उस क्षण कैसा रोमांच, कैसी भावुकता और भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का कैसा उत्साह तब की जनता और नेताओं के मन में रहा होगा, इसका सही वर्णन वे ही कर सकते हैं, जिन्होंने उसे जिया है।

झारखंड

राँची

जमशेदपुर

धनबाद

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