झारखंड के प्रमुख त्योहारों में एक है टुसू। आपसी सदभावना के इस पर्व में संगीत की प्रधानता होती है। इस दिन को झारखंड में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। हर ओर जश्न सा माहौल टुसू की पहचान बन गई है। इसकी शुरुआत टुसू की प्रतिमा स्थापित करने से होती है फिर इसका पौष संक्रांति के दिन विसर्जन होता है। टुसू को मुहल्ले अथवा गांव में एक निश्चित घर में स्थापित किया जाता है। शाम को युवतियां एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होकर टुसू के गीत गाती हैं।
मान्यताओं के अनुसार टुसू एक गरीब कुरमी कृषक की सुंदर कन्या थी। उसकी सुंदरता की चर्चा धीरे-धीरे संपूर्ण राज्य में हो गई। यह चर्चा तत्कालीन क्रूर राजा के दरबार तक भी पहुंची। राजा ने टुसू को पाने के लिए रणनीति बनाई। उस वर्ष राज्य में भीषण अकाल पड़ा था। किसान लगान देने के हाल में नहीं थे। इसका फायदा उठाते हुए राजा ने लगान दुगुना कर दिया तथा जबरन वसूली शुरू करवा दी। राज्य के कृषक इससे परेशानी में पड गये। राजा के आतंक से निपटने के लिए टूसू कृषक संगठन बनाकर आगे आयी। राजा के सैनिकों और कृषकों की सेना के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में हजारों किसान मारे गए। किसानों को हार मानना पडा। लेकिन टुसू गिरफ्त में नहीं आयी और उसने उफनती नदी में कूद कर अपनी जान दे दी। इस तरह वह शहीद हो गई। टुसू का पर्व उस साहसी युवति की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है और टुसू की प्रतिमा का नदी में विसर्जन कर एक तरह से समाज उसे अपनी श्रद्धांजलि देता है। झारखंड में इस पर्व की महत्ता का अहसास इसी से हो जाता है कि अधिकांश कार्यालयों और कार्यस्थलों पर लोग अवकाश पर चले जाते है। काम लगभग ठप सा हो जाता है। टुसू का उत्साह यहां लोग डूब कर मनाते है और यह कई दिनों तक चलता है।



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