

एक पाठक
दैनिक भास्कर जमशेदपुर का संस्करण देखा. पहले पेज पर दो तसवीर छपी थी. दोनों तसवीर किसी नृत्य के थे. तसवीर के नीचे उस तसवीर छापने का मकसद लिखा था. जिसमें उस तसवीर पर टिप्पणी की गई थी. अखबार के मुताबिक उस कार्यक्रम में पेश किए गए नृत्य अश्लील थी. अगर अश्लील नहीं थी तो शालीन भी नहीं थी.
जमशेदपुर सांस्कृतिक नगरी है. या यह कह सकते हैं कि यहां कई संस्कृति का मिश्रण है. अखबार का ऐसा कहना बिल्कुल ही गलत है कि कार्यक्रम में अश्लींलता परोसी जा रही है. या यहां किसी भी कार्यक्रम में अश्लील नृत्य ही परोसी जाती है. अखबार ने उस कार्यक्रम में बच्चों की उपस्थिति की बात कही है. और माना है कि उस नृत्य देख कर बच्चे बदनामी और जवानी का मतलब नहीं समझते. बच्चे घर पर टीवी भी देखते हैं. वे सिर्फ कार्टून नेटवर्क ही नहीं ऐसे कई और प्रोग्राम भी देखते ही होंगे. जिसमें इस तरह के कई कार्यक्रम भी होंगे.
असल मुद्दा यह है कि अखबार ने सस्ती लोकप्रियता के जो तसवीर अपने पहले पेज पर छापी है उसका क्या तात्पर्य है. अगर अखबार कह रही है कि वह नृत्य के दृश्य अश्लील है तो उसे अपने पहले पेज पर क्यों छापा. उस कार्यक्रम में तो कुछ लोग होंगे या कुछ ही बच्चे होंगे. लेकिन एक अखबार की पहुंच कई लोगों तक होती है. उसे सभी वर्ग के लोग देखते हैं. अगर अखबार की ही माने तो अश्लीलता फैलाने का काम वह अखबार ही कर रहा है.
अखबार इस बहाने तथाकथित अश्लील फोटो ही बेच रहा है. सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए पत्रकारीय मूल्यों की भी परवाह नहीं कर रहा है. अगर अखबार जमशेदपुर की संस्कृति पर सवाल उठा रहा है तो उसे पहले अपने गिरेबान में झांक कर देख लेना चाहिए.
सभ्यता और संस्कृति की बात करने वाले पहले अपने गिरेबान झांक लें. सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए संस्कृति के साथ खिलवाड़ न करें. इससे पहले भी अखबार ने एक तसवीर छापी थी. जमशेदपुर की संस्कृति बचाने आए अखबार पहले यह जान लें कि यहां की संस्कृति क्या है उसके बाद ही किसी चीज पर टिप्पणी करें.











