भास्कर में अंदरुनी विवाद सतह पर
झारखंड के मीडिया महासंग्राम में जोशखरोश के साथ उतरे दैनिक भास्कर प्रबंधन को इन दिनो जमशेदपुर में दो अलग मोर्चो पर जुझना पड रहा है। एक और प्रबंधन और अखबार के भीतर का विवाद तो दूसरी ओर बाजार में नंबर एक बनने की होड। जनवरी माह में अपने ही अखबार की महिला पत्रकार संग रात लगभग 2 बजे सडक हादसे में सिटी प्रभारी के घायल होने और दोनों पर सामूहिक कार्रवाई के बावजूद अनुशासन के मोर्चे पर अखबार में बिखराव साफ नजर आ रहा है।
इसका पता हाल में ही प्रिंटर डेस्क के मनोज कुमार और ग्राफिक्स एक्सपर्ट्स के बीच जब गर्मागम छिडी बहस से हुआ जब एक पक्ष ने महिला कर्मचारियों की उपस्थिति में ही गन्दी गलियों का जमकर प्रयोग किया। इस बहस के घंटों बाद चैम्बर से निकले संपादक डॉ संतोष मानव इतने दुखी हुए कि स्वयं रो पडे। मनोज अपने दोस्त संजीत कुमार के लिए आवाज बुलंद कर रह थे। लेकिन डॉ मानव मनोज से साफट कार्नर रखने के कारण कुछ कह नहीं सके। बताया जाता है कि यह स्थिति भास्कर के लिए जमशेदुपर में नयी नहीं है। संपादक डॉ मानव और प्रोडक्सन हेड में अख़बार शुरू होने के साथ ही विवाद शुरू हो गया था। तब स्टेट हेड ओम गौड़ को स्वयं हस्तक्षेप करना पडा। इसके बाद डीएनई ललित नारायण सिंह और प्रोडक्सन के मिश्र जी भिड गए। बाद में सब एडिटर अमित और किशोर ऐसे भिड़े कि अमित को नौकरी छोड़ भागना पड़ा बाद में मान मनोवल के बाद लौटे। डॉ मानव कि सिस्टम हेड अभिषेक से तकरार पर जो बकायदा प्रबंधन ने जांच शुरू कर दी थी तो एचआर हेड ब्रिथा गांगुली ने प्रताड़ना से तंग आ कर संपादक की शिकायत उपर कर दी है। बताया जा रहा है कि भास्कर के भीतर रिपोर्टरों के बीच गुटबंदी चरम पर है। हिंदुस्तान से आए अजय शंकर, चीफ रिपोर्टर श्रीकांत और दैनिक जागरण से आए अश्विनी के गुट शम्भू श्रवण, मुकेश ठाकुर और संतोष मिश्र को संपादक से दूर करने की युगत में जुटे है। पूर्व सिटी चीफ और महिला कर्मचारी पर प्रबंधन की कडी कार्रवाई और दोनों के तबादलों के बावजूद इसी संस्थान के एक स्ट्रिन्गेर और एक महिला कर्मचारी की नजदीकी अन्य सहयोगियों की आंखों में खटक रही है। अनुशासन को लेकर कहीं न कहीं संपादक डा संतोष मानव भी प्रबंधन के निशाने पर है। कहां जा रहा है नंबर एक के मोर्च पर कमरकर कर आगे बढने वाले दैनिक भास्कर को आंदरुनी मोर्चे पर लग रहा झटका खतरनाक साबित हो सकता है। यही कारण है कि प्रबंधन दुसरे अखबारों से लोगों को तोडने की योजना पर भी काम कर रहा। इसके लिए भास्कर प्रबंधन प्रभात खबर के ब्रजेश सिंह, राकेश सिंह, अशोक झा, देवेन्द्र आदि के संपर्क में है। इन्हें भारी भरकम आफर भी दिया गया है लेकिन यहां भीतरी स्तर पर चल रही अव्यवस्था के कारण ये भास्कर में जाने से कतरा रहे है।
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ab boria bistar badh le, kuki apke din lad gai hai.. apne hanuman ke sath aapne jo sahar me khel kela tha ab wahi khel ap par bhi bhari parne wala hai. kai logo ki baddua li hai, kiske liye ye ab sochne ka samay hai.. chahe jiske liye ho to fal kaun bhogega mahasay.... tayar ho jai jald hi kaman katne wala hai...
यही सच है हमें पहले यह देखना होगा कि जो दूसरों को सिखलाते है उसे स्वयं कितना अपनाते है। लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है। लोग केवल सीख देते है, जो जितनी बडी कुर्सी पर है उतना बडा विद्वान हो जाता है और फिर उसे हक मिल जाता है दूसरे के बारे में निर्णय लेने का। शायद यही कारण है कि अब शहर का एक बडा अखबार का प्रबंधन अपने सहयोगियों को धमकाने में लगा हुआ है। लेकिन इसके बीच यह नहीं मालूम कि ऐसा करने से सच झूठ में नहीं बदल जाता है, सफल इनसान को अपने गुस्से पर काबू रखना पहले सीखना चाहिए। नहीं तो यही गुस्सा इनसान के पतन का कारण बनता है। इसलिए सहयोगियों से सहयोग करे तभी घर की बातें बाहर नहीं जाएंगी अन्यथा यही सब होता रहेगा, वरना लंका में भी विभिषण था ही न .............
लेकिन जब उनकी निजी जिंदगी और संस्थान के भीतर का सच सामने आता है तुम जैसे तेलु पत्रकारों को परेशानी होने लगती है। अचानक नैतिकताएं सामने आ जाती है और एक से बढकर एक लिखाड भी मोर्चे पर नैतिकता की दुहाई देते हुए उतर आते है। मै राजेश की बात से पूरी तरह सहमत हूं कि ये नेट का डाट काम निकल जाने से जनता का कुछ भला हो गया है, कम से कम अपनी बात तो लिख लेते है वरना संपादक के खिलाफ बोलने की हिम्मत कौन जुटाता है।
लेकिन तुमको यह बात भी शायद पता है कि नहीं कि अखबार के प्रभावी प्रबंधन अपनी भूल सुधारने के बजाय चैनलों पर ही अंकुश लगाने की सोचने लगते है, मानों आंख बंद करने लेने से जहां में अंधेरा ही छा जाएगा। अभी जमशेपुर के मीडिया हाउस में भडास और खबरवाला आदि चैनल को खोलने पर पाबंदी लगा दी गई है। क्यूं यह जबाव अखबारों को प्रबंधन को देना चाहिए कि अगर वे गलत नहीं है तो बचने के लिए यह रास्ता क्यूं अपनाया ? सच लिखते है सच का ढोल पीटते है लेकिन सच पढने में क्यूं गुरेज करते है ? क्यूं डर लगता सच का सामना करने में इन्हें ? अगर कोई सूचना गलत है तो उन्हें भी अपनी बात रखनी चाहिए ? क्यूं सभी अखबार के संपादक उन लोगों से शायद यही बात कहते है जिनके निजी जिंदगी में वे चीडफाड करते है। फिर अपनी बात रखने से वे क्यूं पीछे हट जाते है ?
aap to mahan hai ? media se hai ya kahi aur se nahi bataya apne ? agar aap media se hai to bahut aage jayengi. sambhav ho editor ban jaye. par ye sab apki yogayata ke karan nahi hoga ? apke issi vichar ke karan aap aage jayengi. media me apke jaisi mahilao ki jarurat hai, jo apne uccha vichar se kam karne walo ka haq kuchalte hui aage bad jati hai. yaha kai exmpl hai. apko apke ucch vichar ke liye badhai. apke vichar se same organisation me reported apne colleagues (be it girl or a boy) ke sath kahi bhi kabhi bhi ja sakta hai, yah jurm nahi hai ? to ku nahi puchti DAINIK BHASKAR ke managment se ki usne 2 logo par action kis aadhar par liya ? yah crime ku kiya ????? iska jawab lekar aaye ?? tab baat kare ???
बहुत अधिक दर्द हुआ आपको महसूस होता है, कोई खास बात तो नहीं है न। अन्यथा यह सच है कि मीडिया हाउस के भीतर चल रहे शोषण पर न तो कभी आवाज उठी है न ही यह बाते सामने आयी है। भला हो इन डाट काम वालो को कोई तो मंच दिया कि पत्रकार भी चुपचाप अपनी बात कहने लगे वरना मीडिया हाउस की गंदगी पर कोई बोलेगा। आपकी बात बहुत हद तक ठीक है कि खबर की सच को पूरी तरह जान कर ही प्रकाशित किया जाए, लेकिन यह भी तो सच है कि यहीं मीडिया वाले जब किसी के पीछे पडते है तो उसकी ऐसी की तैसी करने में कोई कसर नहीं छोडते। तब आप जैसे नैतिकतावादी न जाने कहा चले जाते है। रही बात खबर की तो यह पब्लिक है सब जानती है, भास्कर में क्या चल रहा है यह बात शहर के पत्रकारों से छुपी थोडे ही है आधी हकीकत है तो आधा फसाना है।
तब तो खूब खबर रख रहे हो आजकल लेकिन यार कुछ सोचा, दुखी आदमी को और दुखी करने का क्या फायदा। इसलिए पत्रकारों की तरह प्रोफेसन की बात करें, आज की दुनिया में यही प्रोफेसन है कि उपयोग किया और छोड दिया। तो इसमें क्या आश्चर्य की कोई कहां है और क्या कर रहा है। मीडिया में ऐसे लोग ही बुलंदी को पाते है उंचाई पर यही लोग पहुंचते है और सफलता भी इन्हें ही मिलती है, वरना 24 घंटे ईमानदारी से काम करने वालों को हाल हमने भी देखा है यहां। कुछ नहीं होता।